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मां के साथ सड़कों पर बेचते थे चूड़ियां, विकलांग थे, लेकिन हर मुश्किल को दी मात, बने IAS अधिकारी

व्यक्ति के जीवन में सम-विषम परिस्थितियां उत्पन्न होती रहती हैं। अगर व्यक्ति में कुछ करने का जज्बा हो तो कठिन से कठिन काम में भी कामयाबी पा सकता है। अगर इंसान का मजबूत इरादा है तो किसी भी काम को पूरा करने में दुनिया की कोई भी ताकत उसको हरा नहीं सकती है। बड़ी से बड़ी परेशानियां भी मजबूत हौसले के आगे घुटने टेक देती है। देश-दुनिया में ऐसे बहुत से लोग हैं जो अपने जीवन की मुसीबतों को पार करते हुए सफलता की लगातार सीढ़ियां चढ़ते रहते हैं। आज हम आपको एक ऐसे शख्स की जानकारी देने जा रहे हैं जो विकलांग है, परंतु इसके मजबूत हौसले ने इसको ऐसे मुकाम पर खड़ा कर दिया, जिसका सपना हर नौजवान देखता है। हम आपको आज एक ऐसे चूड़ी बेचने वाले शख्स के बारे में जानकारी देने जा रहे हैं, जिसकी मेहनत को देखकर लोग उसे सलाम करते हैं।

मां के साथ सड़कों पर बेचते थे चूड़ियां

आज हम आपको जिस शख्स के बारे में जानकारी दे रहे हैं उनका नाम रमेश घोलप है, जो वर्तमान समय में युवाओं के लिए एक प्रेरणा है। रमेश बचपन से ही विकलांग है और यह अपने परिवार की जिम्मेदारियों के बोझ तले दबे हुए थे, लेकिन इनके जीवन की कोई भी कठिन परिस्थिति इनके हौसले को कमजोर नहीं कर पाई। इनके सामने एक से बढ़कर एक बहुत सी कठिनाइयां उत्पन्न हुई थी परंतु इन सबके बावजूद इन्होने सभी का डटकर सामना किया।

आपको बता दें कि महाराष्ट्र के महागांव में रमेश के पिता जिनका नाम गोरख घोलप है, यह एक साइकिल की दुकान चलाते थे। इनको शराब पीने की लत थी। इनके परिवार में 4 सदस्य थे, परंतु जो पिता कमाई करते थे, वह सारे पैसों का शराब पी लिया करते थे, जिसके कारण घर का गुजारा चलाना बहुत ही मुश्किल हो रहा था। जब शराब पीने की आदत से रामू के पिता की हालत खराब हो गई तब इनको एक सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया।

आर्थिक तंगी से उसके पिता ने गैर जिम्मेदाराना सरकारी हस्पताल और डॉक्टरों की बेरुखी से इलाज के दौरान दम तोड़ दिया था। पड़ोसियों की मदद से इन्होंने अपने पिता का अंतिम संस्कार किया। तब सारी जिम्मेदारी रामू की माता के ऊपर आ गया। रामू अपनी माता विमल घोपल के साथ चूड़ियां बेचने लगे। रामू के बाएं पैर में पोलियो मार गया था, परंतु इसके बावजूद भी इन्होंने अपनी माता के काम में पूरा हाथ बटाया और गली गली चूड़ियां बेचने लगे।

रमेश घोपल का लक्ष्य कुछ और ही था

रमेश ने 12वीं कक्षा में 88.5% नंबरों से परीक्षा पास की थी। इसके बाद इन्होंने एक डिप्लोमा कर लिया था और गांव के ही एक विद्यालय में शिक्षक बन गए थे। डिप्लोमा करने के पश्चात इन्होंने बीए की डिग्री भी हासिल की थी। शिक्षक बनकर यह अपने परिवार का खर्चा चला रहे थे, लेकिन इनका लक्ष्य कुछ और ही रही था। रमेश ने 6 महीने के लिए नौकरी छोड़ दी और इन्होंने पढ़ाई करके यूपीएससी ( UPSC) की परीक्षा दी।

पहली बार में नहीं मिली सफलता

आपको बता दें कि 2010 में रमेश ने यूपीएससी की परीक्षा दी थी परंतु उनको सफलता नहीं मिल पाई थी। उन्होंने गांव वालों से पैसे उधार लेकर पुणे में सिविल सर्विसेज की पढ़ाई करने लगे थे और इन्होंने यह कसम खाई थी कि जब तक वह बड़े अफसर नहीं बन जाते, तब तक गांव वालों को अपनी शक्ल नहीं दिखाएंगे। आखिर में इनकी मेहनत रंग लाई और 2012 में रमेश ने यूपीएससी की परीक्षा में 287वीं रैंक प्राप्त की। अनपढ़ मां-बाप का बेटा इस तरह IAS अफसर बन गया।

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