चाणक्य नीति: जीवन में इन 4 चीजें से टूट के बिखर जाता है इंसान, खुशी का नामोनिशान नहीं दिखता है

आचार्य चाणक्य (Acharya Chanakya) अपने जमाने के सबसे बड़े विद्वान माने जाते हैं। उन्होंने अपने जीवनकाल में कई चीजों का अनुभव लिया है जिसके आधार पर चाणक्य नीति (Chanakya Neeti) लिखी गई। यदि व्यक्ति इन नीतियों को अपना ले तो उसे धन, तरक्की, दुख-सुख और वैवाहिक जीवन से जुड़ी कोई दिक्कत नहीं होगी।

आज हम आपको चाणक्य नीति की उन चार बातों को बताने जा रहे हैं जिसके कारण इंसान अंदर से बुरी तरह टूट जाता है। ये चीजें उसके जीवन में दुख का भंडार ला देती है। इसलिए व्यक्ति को जहां तक हो सके इन चार चीजों से दूर ही रहना चाहिए। तो चलिए फिर बिना किसी देरी के जानते हैं कि वे चीजें क्या है।

जीवनसाथी की जुदाई: आचार्य चाणक्य के अनुसार व्यक्ति कभी भी अपने जीवनसाथी से दूर नहीं जाना चाहता है। यदि प्रेम सच्चा हो तो उसका वियोग उसे अंदर से तोड़कर रख देता है। वह ये जुदाई सह नहीं पाता है। उसे पार्टनर का बिछड़ना अंदर ही अंदर खाए जाता है। इसलिए पूरी आपके पास जितना भी समय है उसे अपने जीवनसाथी के साथ हंसकर और प्रेमपूर्वक बिताना चाहिए। कोई ऐसा काम ना करें जिससे आप दोनों को बिछड़ना पड़ जाए।

कर्ज का वजन: चाणक्य के मुताबिक जब किसी व्यक्ति के सिर पर कर्जा होता है तो वह अंदर ही अंदर खुद को दबा हुआ महसूस करता है। एक बार वह कर्ज लेने के बाद वह अपराध बोध से जीने लगता है। यह कर्ज उसे अंदर ही अंदर तोड़ देता है। उसे रात दिन इस कर्ज को अपने सिर से उतारने की चिंता खाए जाती है। इसलिए इंसान को जहां तक हो सके कर्ज लेने से बचना चाहिए। जितनी चादर हो उतने ही पैसे पसारने चाहिए।

अपनों के द्वारा अपमान: एक बार कोई गैर व्यक्ति हमारा अपमान कर दे तो सहन हो जाता है। लेकिन जब कोई अपना ही मान सम्मान को ठेस पहुँच दें तो सहन नहीं हो पता है। ऐसे में व्यक्ति को मानसिक चोट लग जाती है। अपने करीबियों द्वारा किए गए अपमान से वह अंदर ही अंदर टूट के बिखर जाता है। उसकी हिम्मत जवाब दे जाती है। इसलिए जहां तक हो सके हमे अपने करीबियों को अपमान नहीं करना चाहिए। उन्हें पूरा मान सम्मान देना चाहिए।

गरीबी की बाढ़: चाणक्य नीति की माने तो धन के अभाव में व्यक्ति हमेशा दुखी ही रहता है। खासकर गरीबी का दलदल उसके दुख को कम नहीं होने देता है। आर्थिक परेशनियाँ व्यक्ति को अंदर से तोड़कर रख देती है। पैसों की तंगी के चलते वह अपनी या परिवार की जररूतों को पूर्ण नहीं कर पाता है।

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