क्यों रखा जाता है अहोई अष्टमी का व्रत, जानिए इससे जुड़ी सभी मान्यताएं

इस साल 2020 में नवंबर के महीने में त्यौहारों की भरमार है, इसमें करवा चौथ, छठपूजा, धनतेरस, दिवाली के अलावा भी कई दूसरे त्यौहार हैं और अहोई अष्टमी का व्रत बेहद खास है। यह व्रत संतान के दीर्घायु के लिए किया जाता है। बता दें कि हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन यह व्रत रखा जाता है। इस साल अहोई अष्टमी का व्रत 8 नवंबर को होगा। ये त्यौहार खासतौर पर उत्तर भारत में मनाया जाता है। बता दें कि इस दिन अहोई देवी की पूजा की जाती है। आइए जानते हैं अहोई अष्टमी व्रत के बारे में पूरी जानाकारी…

जानिए अहोई अष्टमी का शुभ मुहूर्त

8 नवंबर 2020 दिन रविवार की शाम 5 बजकर 26 मिनट से 6 बजकर 46 मिनट तक अहोई अष्टमी का शुभ मुहूर्त होगा। अष्टमी तिथि 8 नवंबर की सुबह 7 बजकर 28 मिनट से शुरू होकर 9 नवंबर की सुबह 6 बजकर 50 मिनट में समाप्त होगा।

अहोई अष्टमी व्रत विधि

अगर आप अपने पुत्र के लिए व्रत रखना चाहते हैं, तो अहोई अष्टमी के दिन सूर्योदय से पहले उठ जाएं और स्नान करके व्रत करने का संकल्प करें। इसके बाद दीवार पर गेरू से अहोई माता का चित्र बनाएं और सेह व उसके पुत्रों का भी चित्र बनाएं। शाम को पूजा करने से पहले अहोई माता के चित्र के सामने एक चौकी रखें और उस पर जल से भरा एक कलश रख दें, कलश पर स्वास्तिक बना लें। इसके बाद सिंदूर की रोली और चावल से माता अहोई की पूजा करें और  हाथ में गेहूं के सात दाने लेकर अहोई माता की कथा सुनें और मीठा पुड़ी और हलवा बनाकर माता को भोग लगाएं। इसके उपरान्त तारों को अर्घ्य देकर अपने से बड़ों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें।

अहोई अष्टमी व्रत का महत्व

मान्यता है कि अहोई अष्टमी के दिन व्रत रखने से संतान के सभी कष्टों का निवारण होता है। साथ ही उनके जीवन में सुख समृद्धि आती है। अगर आपके संतान को किसी प्रकार की शारीरिक कष्ट हो, स्वास्थ्य ठीक न हो यानी बार बार बीमार पड़ते हों तो आपको अहोई अष्टमी का व्रत जरूर रखना चाहिए। माना जाता है कि ऐसा करने से संतान को विशेष लाभ पहुंचता है और आपको संतान की ओर से कुछ अच्छे समाचार भी सुनने को मिलते हैं।

कौन हैं मां अहोई

बता दें कि अहोई, अनहोनी का अपभ्रंश शब्द है और अनहोनी टालने वाली देवी पार्वती हैं। यही कारण है कि इस दिन माता पार्वती की विशेष पूजा अर्चना की जाती है। अपनी संतानों को दीर्घायु और अनहोनी से बचाने के लिए खासकर माताएं ये व्रत रखती हैं और माता पार्वती से अपनी संतानों के लिए आशीर्वाद मांगती हैं।

अहोई अष्टमी व्रत कथा

अहोई अष्टमी व्रत कथा के अनुसार पौराणिक काल में एक नगर में किसी साहूकार के सात लड़के थे। दीपावली का पर्व आने वाला था तो साहूकार की पत्नी कुदाल लेकर मिट्टी लेने के लिए खदान में पहुंच गई। साहूकार की पत्नी ने जैसे ही कुदाल चलाना शुरू किया, उसकी कुदाल वहां मौजूद सेह की मांद में लग गई और सेह के बच्चे को कुदाल लगने से उसकी आकस्मिक मौत हो गई।

साहूकार की पत्नी को इस घटना का बहुत दुख हुआ, क्योंकि उसके हाथों सेह के बच्चे की हत्या हुई थी। इसके बाद वह दुखी मन से घर लौट आई। कुछ ही दिनों बाद उसके एक बेटे का निधन हो गया और फिर अचानक दूसरे बेटे की भी मौत हो गई। ऐसे देखते ही देखते साल भर में उसके सभी बेटों का निधन हो गया। अपने सभी पुत्रों को खोन के बाद महिला अत्यंत दुखी हो गई।

एक दिन अपने दुखों को बांटते हुए उसने अपने आस पड़ोस की महिलाओं को बताया कि मैंने कभी जानबूझकर कभी कोई पाप नहीं किया। हां एक बार, खदान में मिट्टी खोदते हुए मेरे हाथों से एक सेह के बच्चे की मौत जरूर हो गई थी और उसके बाद से मेरे सभी सातों पुत्रों की मौत हो गई। साहूकार की पत्नी की दुख भरी कहानी सुनकर आस पड़ोस की महिलाओं ने कहा कि ये बात बताकर तुमने जो पश्चाताप किया है, उससे तुम्हारा आधा पाप नष्ट हो गया।

यही नहीं बल्कि महिलाओं ने साहूकार की पत्नी को ये भी बताया कि तुम अष्टमी को देवी पार्वती की शरण लेकर सेह और सेह के बच्चों का चित्र बनाओ और उसकी पूजा करो और क्षमा मांगो। देवी पार्वती तुम्हारे सारे पाप नष्ट कर देंगी। उन महिलाओं की बात मानकर साहूकार की पत्नी ने कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को उपवास व पूजा अर्चना की। वो हर वर्ष ऐसा करती रही और उसे सात पुत्रों की प्राप्ति हुई। तभी से अहोई अष्टमी व्रत की परंपरा चल रही है।

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