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आखिर क्यों सुहागिनों के लिए वट सावित्री व्रत होता है खास, जब यमराज को भी झुकना पड़ा, पढ़ें कथा

10 जून गुरुवार को वट सावित्री व्रत मनाया जाएगा। यह व्रत ज्येष्ठ महीने की अमावस्या को मनाया जाता है। इस दिन बरगद के पेड़ की पूजा और उसकी परिक्रमा की जाती है। यह व्रत महिलाओं के लिए बहुत ही खास माना गया है। सुहागिन महिलाएं ज्येष्ठ कृष्ण त्रयोदशी से अमावस्या तक तीनों दिनों के लिए व्रत उपवास रखती हैं। कुछ महिलाएं ऐसी भी होती है जो सिर्फ अमावस्या के दिन ही व्रत करती हैं। वट सावित्री व्रत के दिन महिलाएं बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं और इस दिन देवी सावित्री के त्याग, प्रति प्रेम एवं पतिव्रत धर्म की कथा का स्मरण करती हैं।

हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत का बहुत महत्व बताया गया है। यह व्रत स्त्रियों के लिए सौभाग्य वर्धक, पाप हारक और धन-धान्य प्रदान करने वाला माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि अगर कोई सुहागिन महिला वट सावित्री व्रत का व्रत करती है तो उसे अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। यह व्रत करने वाली महिलाएं पुत्र-पौत्र-धन आदि पदार्थों को प्राप्त कर चिरकाल तथा पृथ्वी पर सब सुख भोग कर पति के साथ ब्रह्मलोक को प्राप्त करती हैं।

ऐसा माना जाता है कि बरगद के पेड़ की जड़ में ब्रह्मा जी, तने में भगवान विष्णु जी और डालियों में भगवान शिव जी का निवास होता है। बरगद के पेड़ की बहुत सारी शाखाएं ऐसी होती हैं जो नीचे की तरफ लटकी हुई होती हैं। इन शाखाओं को देवी सावित्री का रूप माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि अगर बरगद के पेड़ की पूजा की जाए तो इससे सारी मनोकामनाएं बहुत जल्द पूरी हो जाती हैं।

आपको बता दें कि शास्त्रों में बरगद के पेड़ के बारे में बहुत सी महत्वपूर्ण जानकारियां देखने को मिलती है। अगर हम अग्नि पुराण के अनुसार देखें तो बरगद उत्सर्जन को दर्शाता है। अतः संतान प्राप्ति के लिए इच्छुक महिलाएं भी इस व्रत को रखतीं हैं। बरगद के वृक्ष को अनश्वर माना गया है। ऐसा बताया जाता है कि बरगद के पेड़ की की छांव में ही देवी सावित्री ने अपने पति को पुनः जीवित किया था। इसी वजह से ऐसा माना जाता है कि महिलाएं अचल सुहाग की प्राप्ति के लिए वट सावित्री व्रत के दिन बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं।

वट सावित्री व्रत पूजा विधि

जो महिलाएं वट सावित्री व्रत पूजा कर रही हैं। वह इस दिन बांस की टोकरी में सप्तधान्य के ऊपर ब्रह्मा और ब्रह्मसावित्री तथा दूसरी टोकरी में सत्यवान और सावित्री की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित कर बरगद के नीचे बैठकर पूजा करें। इसके साथ ही इस दिन यमराज जी की भी पूजा कीजिए। पूजा में आप लाल वस्त्र, सिंदूर, पुष्प, अक्षत, रोली, मोली, भीगे चने, फल और मिठाई का इस्तेमाल जरूर कीजिए।

व्रत के दिन कच्चे दूध और जल से बरगद के पेड़ की जड़ सींचकर तने में 7 बार कच्चा सूत या मौली लपेटकर परिक्रमा कीजिए। जब पूजा हो जाए तो आप सच्चे मन और भक्ति भाव से सत्यवान सावित्री की कथा पढ़ें और सुनें। अगर आप ऐसा लारतीं हैं तो इससे परिवार में आने वाली बाधाएं नष्ट हो जाती हैं। घर में सुख-शांति, समृद्धि आती है।

आपको बता दें कि वट सावित्री व्रत के दौरान पूजा में भीगे हुए चने अर्पण करने का बहुत महत्व माना जाता है। ऐसा बताया जाता है कि यमराज ने चने के रूप में ही सत्यवान के प्राण सावित्री को दिए थे। तब सावित्री चने को लेकर सत्यवान के पास आई थी और चने को सत्यवान के मुख्य में रख दिया। इससे सत्यवान पुनः जीवित हो गए थे।

जब यमराज को भी झुकना पड़ गया था

वट सावित्री व्रत का उल्लेख पौराणिक ग्रंथों स्कंद पुराण और भविष्य पुराण में विस्तार पूर्वक किया गया है। भविष्य पुराण के मुताबिक देवी सावित्री राजा अश्वपति की कन्या थीं। सावित्री ने सत्यवान को पति के रूप में स्वीकार किया था परंतु नारद जी ने यह भविष्यवाणी की थी कि सत्यवान अल्प आयु है। सावित्री के हृदय में निरंतर भटकती रहती थी। जब सत्यवान की आयु पूरी होने पर आई तक सावित्री ने यह विचार किया था कि अब मेरे पति की मृत्यु का समय निकट आ चुका है। यह मन में विचार लिए वह सत्यवान के साथ काष्ठ लेने जंगल जाने लगी। एक दिन सत्यवान को लकड़ियां काटते समय मस्तक में बहुत तेज दर्द हुआ और सावित्री से सत्यवान ने कहा था कि प्रिय! मेरे सिर में बहुत व्यथा है इसलिए थोड़ी देर विश्राम करना चाहता हूं। तब सावित्री ने अपने पति का सिर अपनी गोद में रख लिया और सत्यवान उनकी गोद में सिर रखकर आराम करने लगे।

जब सावित्री की गोद में उनके पति आराम कर रहे थे तो उसी दौरान भैंस पर सवार होकर यमराज सावित्री के पति के प्राण हरने के लिए आए थे। तब सावित्री ने यमराज को पहचान लिया था और उन्होंने यमराज से कहा था कि आप मेरे पति के प्राण ना लें परंतु यमराज जी बिल्कुल भी नहीं माने और उन्होंने सत्यवान के शरीर से प्राण खींच लिए। यमराज सत्यवान के प्राण लेकर यमलोक की तरफ निकल गए। सावित्री भी उनके पीछे पीछे चल पड़ीं।

बहुत दूर जाने के पश्चात यमराज ने सावित्री से यह कहा था कि पतिव्रते, अब तुम लौट जाओ। इस मार्ग में इतनी दूर कोई नहीं आ सकता। तब सावित्री ने यमराज को यह कहा था कि महाराज पति के साथ आते हुए ना तो मुझे कोई ग्लानि हो रही है और ना ही कोई श्रम हो रहा है। मैं सुख पूर्वक चल रही हूं। जिस प्रकार सज्जनों की संगति संत है। वर्णाश्रम ओं का आधार वेद है। शिष्य का आधार गुरु और सभी प्राणियों का आश्रय स्थान पृथ्वी है उसी प्रकार स्त्रियों का एकमात्र आश्रय स्थान उनका पति है। अन्य कोई नहीं। जब यमराज में सावित्री की यह बात सुनी तो वह बहुत प्रसन्न हुए। सावित्री के पति धर्म से प्रसन्न होकर यमराज ने वर रूप में अंधे सास-ससुर को आंखें दे दी और सावित्री को सौ पुत्र होने का आशीर्वाद भी दिया। इतना ही नहीं बल्कि यमराज ने सत्यवान के प्राणों को लौटा भी दिया था।

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