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बचपन में उठ गया माता-पिता का सिर से साया, नंगे पैर दौड़ी, अब ओलंपिक में करेंगी देश का नाम रोशन

ऐसा कहा जाता है कि अगर इंसान के अंदर कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो वह अपनी मंजिल हासिल कर ही लेता है। वह अपने मजबूत हौसले के दम पर हर मुश्किलों का सामना कर सकता है। वैसे देखा जाए तो किसी भी क्षेत्र में कामयाबी मेहनत से ही प्राप्त की जा सकती है। इंसान का जुनून उसको अपने जीवन में एक सफल व्यक्ति बनाता है। कहानियां हमेशा मुश्किलों, इंसान के जुनून, गरीबी, खून पसीने से ही बनती हैं। हमारे देश में पहले भी ऐसे बहुत से खिलाड़ी रह चुके हैं जिन्होंने गरीब परिवार में जन्म लिया परंतु उन्होंने अपनी मेहनत, खून, पसीना एक करके बुलंदियों को हासिल कर लिया है।

आज हम आपको इस लेख के माध्यम से एक ऐसी महिला खिलाड़ी के बारे में बताने वाले हैं जिसके पास कभी जूते खरीदने तक के पैसे नहीं हुआ करते थे। इस महिला खिलाड़ी का जीवन गरीबी में व्यतीत हुआ। खाने तक के पैसे नहीं रहते थे लेकिन अब वह टोक्यो ओलंपिक में भारत का नाम रोशन करने के लिए पूरी तरह से तैयार हो चुकी है।

दरअसल, आज हम आपको जिस महिला खिलाड़ी के बारे में जानकारी देने जा रहे हैं उसका नाम रेवती वीरामनी है, जिनका जन्म तमिलनाडु में हुआ था। रेवती वीरामनी एक गरीब परिवार से ताल्लुक रखती हैं और अब ये टोक्यो ओलंपिक में भाग लेने जा रही हैं। एक छोटे से गांव से टोक्यो ओलंपिक तक पहुंचने की उनकी कहानी काफी संघर्षों से भरी हुई है।

आपको बता दें कि जब रेवती वीरामनी की उम्र 7 वर्ष की थी तो उनके पिताजी का निधन हो गया था। पिता के निधन के एक साल बाद उनकी माताजी भी इस दुनिया को छोड़ कर चली गई थीं। माता-पिता का साया सर से उठने के बाद रेवती पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। तमिलनाडु में जन्मी रेवती वीरामनी और उनकी बहन को उनकी नानी ने ही पाल पोष कर बड़ा किया है। नानी ने मजदूरी कर इन दोनों लड़कियों की पाला है।

रेवती इतने गरीब परिवार से ताल्लुक रखती हैं कि उनके पास प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए जूते खरीदने तक के पैसे नहीं हुआ करते थे और वह कई बार नंगे पैर भी दौड़ी हैं। आपको बता दें कि जब उनके कोच कानन ने उनका यह टैलेंट देखा तो वह आश्चर्यचकित रह गए थे और उनकी सहायता के लिए तुरंत सामने आ गए। उन्होंने रेवती को जूते दिलवाए इतना ही नहीं बल्कि स्कूल की फीस भी जमा करने में उसकी सहायता की।

आपको बता दें कि रेवती को दौड़ने भेजने के लिए उनकी नानी को समाज से काफी ताने सुनने पड़े परंतु उन्होंने किसी की भी बातों की परवाह नहीं की थी और उन्होंने रेवती को दौड़ में आगे बढ़ने के लिए हमेशा से ही सपोर्ट किया। रेवती के दोस्तों ने भी आर्थिक रूप से उनकी सहायता की थी।

रेवती कई सालों तक संघर्ष करती रही और बाद में दक्षिणी रेलवे में नौकरी लग गई। रेलवे में 400 मीटर की दौड़ 53.55 सेकेंड में पूरी करने पर उन्हें सम्मानित किया गया था। उसके बाद वह 400 मीटर रिले टोक्यो ओलंपिक के लिए चुनी गईं।

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