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सड़क पर ठंड से ठिठुर रहा था भिखारी, मदद के लिए आए DSP को पता चला वो है उन्हीं के बैच का अधिकारी

वैसे देखा जाए तो हर इंसान के जीवन में बहुत से उतार-चढ़ाव आते हैं, जिसका सामना हर किसी को करना पड़ता है। कभी इंसान अपने जीवन में लगातार सफलता के मार्ग पर बढ़ता जाता है तो कभी-कभी ऐसा देखा गया है कि बहुत से लोग सफलता की ऊंचाइयां छू रहे होते हैं, परंतु एक झटके में ही वह सड़क पर भिखारी बन जाते हैं। इस तरह की कहानियां अक्सर आप लोगों ने फिल्मों में देखी होगी परंतु असल जिंदगी में भी कई मामले देखने को मिल जाते हैं।

आज हम आपको कुछ ऐसी ही कहानी उस भिखारी के बारे में जानकारी देने जा रहे हैं, जो एक रात पुलिस अफसरों को सड़क पर ठंड से ठिठुरते हुआ नजर आया था। अक्सर सड़क पर बहुत से भिखारी होते हैं परंतु कई बार जो इंसान भिखारी लगता है, उसकी असलियत कुछ और ही होती है। एक ऐसा मामला मध्य प्रदेश के ग्वालियर से आया है, जिसको जानने के बाद आप भी आश्चर्यचकित हो जाएंगे।

दरअसल, यहां पर डीएसपी साहब ने सड़क किनारे बैठे जब एक भिखारी को देखा तो वह हैरान हो गए। जब वह उस भिखारी की मदद के लिए सामने आए तो उनको बाद में पता चला कि वह भिखारी कोई और नहीं बल्कि उनके ही बैच एक अधिकारी है।

आपको बता दें कि मध्यप्रदेश में पिछले वर्ष उपचुनाव हुए थे। ग्वालियर में उपचुनाव की मतगणना के बाद डीएसपी रत्नेश सिंह तोमर और विजय सिंह भदौरिया झांसी रोड से गुजर रहे थे। जब वह दोनों बंधन वाटिका के फुटपाथ से होकर गुजरे तो उन्होंने एक अधेड़ उम्र का भिखारी ठंड से ठिठुरते हुआ नजर आया। उस भिखारी को देखने के बाद दोनों अफसरों ने अपनी गाड़ी रोक दी और उस भिखारी से बात करने के लिए उसके पास पहुंच गए।

बाद में दोनों अधिकारियों ने उसकी सहायता की। DSP रत्नेश सिंह तोमर ने उस बुजुर्ग अधिकारी को अपने जूते दिए और डीएसपी विजय सिंह भदौरिया ने उस भिखारी को ठंड से बचाने के लिए अपनी जैकेट दे दी थी। इसके बाद दोनों ही अफसर उस भिखारी से बातचीत करने लग गए। जब उस भिखारी की असलियत दोनों अफसरों को पता चली तो वह हैरान हो गए, वह भिखारी DSP के बैच का ही अधिकारी निकला।

खबरों के अनुसार ऐसा बताया जा रहा है कि जब दोनों अफसरों ने उस भिखारी से बातचीत की तो उनको पता चला कि उस भिखारी का नाम मनीष मिश्रा है और वह मध्यप्रदेश का ही रहने वाला है। मनीष मिश्रा भी इन दोनों अफसरों के साथ ही साल 1999 में मध्य प्रदेश पुलिस में सब इंस्पेक्टर के पद पर भर्ती हुआ था। उसके साथी रत्नेश सिंह तोमर और विजय सिंह पदोन्नति पाकर डीएसपी बन गए परंतु मनीष मिश्रा भिखारी बन गया। मनीष मिश्रा ने दोनों साथी अफसरों को पहचान लिया था और उसने अपनी दर्द भरी कहानी उनको बयां की।

आपको बता दें कि मनीष मिश्रा कभी अपने डिपार्टमेंट के शान हुआ करते थे। एक पुलिस ऑफिसर होने के साथ-साथ मनीष अपनी निशानी बाजी के लिए भी जाने जाते थे। अपने बैच के अधिकारी को इस हालत में देखकर दोनों अफसर बहुत दुखी हुए। बता दें। मनीष मिश्रा ने 2005 तक पुलिस की नौकरी की और वह अंतिम समय में दतिया में पोस्टेड थे। धीरे-धीरे उनकी मानसिक स्थिति बिगड़ती गई और उनसे घरवाले भी परेशान होने लग गए थे। वह इलाज के लिए जहां जहां ले जाया करते थे वह वहां से भाग गए। कुछ दिनों के बाद परिवार को भी नहीं पता चला कि मनीष आखिर कहां चले गए हैं।

मनीष की पत्नी भी उनको छोड़कर चली गई। बाद में पत्नी ने उनसे तलाक ले लिया। धीरे धीरे मनीष भीख मांगने लगे। करीब 10 साल तक वह भीख मांगते रहे। जब दोनों अफसरों ने उनको साथ ले जाने की जिद की तो वह उनके साथ जाने से इनकार करने लगे। बाद में दोनों अधिकारियों ने मनीष को एक समाज सेवी संस्थान में भिजवाया और वहां मनीष की देखभाल शुरू हो गई।

आपको बता दें कि मनीष के भाई थानेदार हैं और पिता और चाचा SSP पद से रिटायर हुए हैं। खबरों के अनुसार ऐसा बताया जा रहा है कि उनकी एक बहन किसी दूतावास में अच्छे पद पर है और जिस पत्नी से उनका तलाक हो गया है वह भी न्यायिक विभाग में पदस्थ है।

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